कविता ः जाहि दिन हम मरब
10 महीना पहिले प्रकाशित

लेखक ः
राजन दास
ठेगाना ः सहिदनगर नगरपालिका–०८
बिसरभोरा मधेस प्रदेश
धनुषा
हमर समाज बाजार मे रहत ।
ओ घनिष्ठ मित्र लोकनि स्तब्ध भ’ जेताह ।।
हमर परिवार नष्ट भ’ जायत ।
जाहि दिन हम मरब ।।
हमर टांग आराम करत ।
आँखि देखब छोडीÞ देत ।।
कान सुनब छोडी देत ।
मुँहसँ सम्बोधन,
जाहि दिन हम मरब ।।
कियो हरियर बाँस काटि लेत ।
कियो छूरी कीनय जा रहल अछि ।।
ओहि आगि मे कतेको लोक जमा हेताह ।
जाहि दिन हम मरब ।।
देह मे साँस नहि अछि ।
तहियासँ हम छी ।।
मुँह मे कोनो वाक्य नहि अछि ।
चारि गोटे लऽ कऽ चलत ।।
हमर देहकेँ आगिसँ जरा देत ।
जाहि दिन हम मरब ।।
समाज गीत गाबय लागत ।
सतरु मित्रक व्यवहार देखाओत ।।
पिता नोर नहि देखाओत ।
माँक आँखि मे अविराम नोर बहत,
जाहि दिन हम मरब ।।
हमर समाज आइ चौंक गेल अछि ।
हमर संगी सभ चौंक गेल अछि ।।
ई माहौल चौंकाबय वाला अछि ।
आ हम चौंक गेल छी ,
जाहि दिन हम मरब ।।
ओ कारी कुकुर हमरा खोजय जा रहल अछि ।
ओ चिड़ै पूछत ,
ओ धागा हमर प्रतीक्षा मे रहत ।।
जे बदला मे हमर दिस देखत ।
जाहि दिन हम मरब ।।
सब कियो हमर पिताजी स पूछत ।
सैकड़ो प्रश्न उठत ।।
एकर जवाब मात्र एकटा अछि ।
चौंक गेल चौंक गेल चौंक गेल,
जाहि दिन हम मरि गेलहुँ ।।
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