लेखक ः

                राजन दास
ठेगाना ः सहिदनगर नगरपालिका–०८
            बिसरभोरा मधेस प्रदेश
                      धनुषा


हमर समाज बाजार मे रहत ।
ओ घनिष्ठ मित्र लोकनि स्तब्ध भ’ जेताह ।।
हमर परिवार नष्ट भ’ जायत ।
जाहि दिन हम मरब ।।

हमर टांग आराम करत ।
आँखि देखब छोडीÞ देत ।।
कान सुनब छोडी देत ।
मुँहसँ सम्बोधन,
जाहि दिन हम मरब ।।

कियो हरियर बाँस काटि लेत ।
कियो छूरी कीनय जा रहल अछि ।।
ओहि आगि मे कतेको लोक जमा हेताह ।
जाहि दिन हम मरब ।।

देह मे साँस नहि अछि ।
तहियासँ हम छी ।।
मुँह मे कोनो वाक्य नहि अछि ।
चारि गोटे लऽ कऽ चलत ।।
हमर देहकेँ आगिसँ जरा देत ।
जाहि दिन हम मरब ।।

समाज गीत गाबय लागत ।
सतरु मित्रक व्यवहार देखाओत ।।
पिता नोर नहि देखाओत ।
माँक आँखि मे अविराम नोर बहत,
जाहि दिन हम मरब ।।

हमर समाज आइ चौंक गेल अछि ।
हमर संगी सभ चौंक गेल अछि ।।
ई माहौल चौंकाबय वाला अछि ।
आ हम चौंक गेल छी ,
जाहि दिन हम मरब ।।

ओ कारी कुकुर हमरा खोजय जा रहल अछि ।
ओ चिड़ै पूछत ,
ओ धागा हमर प्रतीक्षा मे रहत ।।
जे बदला मे हमर दिस देखत ।
जाहि दिन हम मरब ।।

सब कियो हमर पिताजी स पूछत ।
सैकड़ो प्रश्न उठत ।।
एकर जवाब मात्र एकटा अछि ।
चौंक गेल चौंक गेल चौंक गेल,
जाहि दिन हम मरि गेलहुँ ।।