कविता ः

नै करु घमण्ड

लेखक ः मनोज पण्डित
      बिदेह न.पा. ७,
    वेलापटटी, धनुषा

 

 

नै फुलाउ साँस लम्बा ।
जन्दगी नै है छोट खब्म्बा ।।

अपने आपमे नै देखाऊ घमण्ड ।
हड्डी चिवाउ देख क कण्ठ ।।

नै त हड्डी अड्कल कण्ठमे ।
चैईल जाईब एकेवेर बैकुण्ठमे ।।

तै स सबके बुझियौ एक सम्मान ।
तबहि करत अहुके इज्जत मान ।।

ई नै सम्झु कि सबस बुभैmछी हम बहुत ।
सब अप्पने आपमे सबल छै आब हम कि कहु त ।।

बात बात मे नै जिद्दी करु ।
सब के बात बुझल करु ।।

सब के वातपर दिऔं ध्यान ।
तबहि होतै सब के कल्यान ।।