कठोर काया
1 वर्ष पहिले प्रकाशित

कविता ः
लेखक ः भोला यादब
किए पढैछी पोथी पुराण,
किए करैछी रामक ध्याण,
इष्ट मित्र भाइ माई कहे वैरी,
वैर करैछी हम हमर पहचान,
झुठ कपट संग छीहे माहान ।
देवी रुप पुज्नीय हमर माता,
नोरेछै हुनकर श्रृङगार ।
दुखः कष्टमे भुइल रहल अछि,
गंगा माई हमर अंगार ।
सीतल जल अंगार केली हम,
वह्रा वह्रा हम अपने सान ।
लिय अहाँ हमर पहचान,
निर्थक घमण्ड संग छिहे महान ।
कठोर काया वियोग नै जाने,
जन्मदाताके नै पहचाने,
धनके लोभ धर्म करैए कुंन्ठीत,
दुधक दाम मनमे नै आने ।
घरी घरी अपुरा महरानी,
विन्ती करे हमरा प्रणाम ।
लिय अहाँ हमर पहचान,
पाप कर्म संगे छिहे महान ।
किए पढैछी पोथी पुरान,
किए करैछी रामक ध्याण,
इष्ट मित्र भाइ माइ कहेवैरी,
वैर संगे हम छीहे महान ।
माईकहे पुत्र अहाँ वनु त्यागी,
व्रmोध लोभ सब त्याग करु ।
सत्य धर्म सुन्दर नितीसँ,
जिवनके सिंगार करु ।
मनपागल हमर व्रmोध लोभमे,
सत्य धर्म नै छै पहचान ।
लिय अहाँ हमर पहचान,
व्रmोध लोभ संगे छिहे महान ।
साँझ मलिन लक्ष्मी घरकाने,
काल चक्रके ऊ पहचाने ।
व्रmोध काल हँसी मनमानी,
कठोर हृदय संग नाच करे ।
उदास देख तारा रानी,
देख दुष्ट उपहास करे ।
सती सावीत्री करु हमर गुण गान,
हमछी वीर हमरे कहु माहान ।
लिय हमर अहाँ पहचान,
अग्निवान संग छिहे महान ।
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